सफल जीवन की शुरुआत एक सपने से होती है, Successful life starts with a dream
सफल जीवन की शुरुआत एक सपने से होती है
सफल लोग अपनी वर्तमान नौकरी, परिवार, सेहत या आमदनी की तरफ़ नहीं देखते। वे भीड़ से आगे निकल जाते हैं और एक छोटा परंतु महत्वपूर्ण काम करते हैं: वे जीवन को उस तरह नहीं देखते जैसा वह है, बल्कि उस तरह देखते हैं जैसा वह हो सकता है। वे देखते हैं कि जीवन कैसा होगा, जब वे इसमें “मैं जीतूंगा" के लगनशील व बुद्धिमत्तापूर्ण प्रयास भर देंगे। किसी काम में प्रगति तभी हो सकती है, जब उसकी संभावनाओं को देखा जाये। प्रगति उस स्थिति में नहीं हो सकती, जब हम सिर्फ़ वास्तविकता को ही देखें । महान आर्किटेक्ट, भवन निर्माता और निवेशक बड़े शहर की झुग्गियों और खंडहरों की वास्तविकता को नहीं देखते। वे इन झुग्गियों को नई बस्तियों में बदलने की संभावनाओं को देखते हैं, जहाँ लोग रहें, काम करें और जीवन का आनंद लें। हर कंपनी, स्कूल, संस्था और इमारत एक सपना है, जिसे किसी ने देखा और हक़ीक़त में बदला।
महान जीवन हमेशा एक महान सपने से शुरू होता है।
हर इंसान के पास दो तरह की दृष्टि होती है : नेत्रदृष्टि (Eyesight) और मस्तिष्कदृष्टि (Mindsight)। नेत्रदृष्टि हमें बताती है कि हमारे चारों तरफ़ कौन सी वस्तुएं हैं। नेत्रदृष्टि वृक्षों, लोगों, इमारतों, पहाड़ों, पानी, सितारों और अन्य भौतिक व मूर्त वस्तुओं की तस्वीरें बनाती है। नेत्रदृष्टि भौतिक है। मस्तिष्कदृष्टि नेत्रदृष्टि से अलग है। मस्तिष्कदृष्टि यह देखने की शक्ति नहीं है कि क्या मौजूद है, बल्कि यह देखने की शक्ति है कि इंसान की बुद्धि के प्रयोग के बाद क्या संभव हो सकता है। मस्तिष्कदृष्टि सपने देखने की शक्ति है। मस्तिष्कदृष्टि भविष्य की तस्वीरें बनाती है - वह घर जिसका हम ख़्वाब देखते हैं, वे पारिवारिक संबंध जो हम चाहते हैं, वह आमदनी जिसका हम आनंद लेंगे, वे छुट्टियाँ जो हम मनायेंगे या वह दौलत जो भविष्य में हमारे पास होगी।
नेत्रदृष्टि पूरी तरह भौतिक है और सिर्फ़ वास्तविकता देखती है। मस्तिष्कदृष्टि पूरी तरह मानसिक है और सिर्फ़ संभावनायें देखती है। मस्तिष्कदृष्टि वह दिखाती है, जो अभी वास्तविक या भौतिक नहीं है। हम सपने देखने की अपनी मस्तिष्कदृष्टि को किस तरह चुनते हैं, इससे हमारी सफलता (उपलब्धि, प्रभाव और संतुष्टि), हमारी संपत्ति (आमदनी, पूँजी और शारीरिक स्वास्थ्य) और हमारा सुख (सम्मान, खुशी और शांति) तय होते हैं। लोगों की नेत्रदृष्टि लगभग एक सी होती है। बहुत कम उम्र में ही सभी बच्चे वस्तुओं को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं, जैसे लोग, इमारतें, सितारे और पानी। परंतु लोगों की मस्तिष्कदृष्टि में बहुत अंतर होता है, यानी उन चीज़ों की मानसिक तस्वीरें देखने में, जो अभी वास्तविक या भौतिक नहीं हैं। ज्यादातर लोग भविष्य को मुश्किलों से भरा “देखते” हैं। नौकरी या बिज़नेस के क्षेत्र में वे एक औसत, कम तनख़्वाह के काम में खुद को ज़िंदगी गुज़ारते “देखते" हैं। सामाजिक जीवन में उनकी मस्तिष्कदृष्टि बहुत कम खुशी “देख” पाती है और यहाँ उन्हें बहुत बोरियत तथा बड़ी समस्यायें “दिखती” हैं। और पारिवारिक जीवन में भी वे ज्यादा से ज्यादा सिर्फ़ एक सामान्य, उबाऊ, समस्याओं से भरा जीवन “देखते” हैं। दूसरी ओर, सफलता की ओर बढ़ रहे कुछ स्वप्नदर्शी भविष्य को चुनौतियों से भरा देखते हैं। वे काम को प्रगति और प्रतिष्ठा की राह के रूप में देखते हैं, जिस पर आगे चलकर बड़े पुरस्कार मिलेंगे। रचनात्मक, स्वप्नदर्शी सामाजिक संबंधों को उत्साहवर्धक, प्रेरक और खुशनुमा नज़रिये से देखते हैं। पारिवारिक जीवन में वे रोमांच, रोचकता और खुशी देखते हैं। वे एक सुखद और अच्छे जीवन का सपना देखने का विकल्प चुनते हैं। हम अपनी जिंदगी को विजेताओं की तरह जियेंगे या पराजितों की तरह, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपनी मस्तिष्कदृष्टि का प्रयोग किस तरह करते हैं हम क्या “देखने" या किस चीज़ के सपने"देखने" का विकल्प चुनते हैं? हममें से हर एक के पास इस जीवन को स्वर्ग या नरक बनाने की शक्ति हैं, इस बात पर निर्भर करती है कि हम इसके बारे में किस तरह के सपने देखने का विकल्प चुनते हैं। जो लोग जीवन को स्वर्ग की तरह देखते हैं, वे विजेता होते हैं; जो लोग जीवन को नरक की तरह देखते हैं, वे पराजित होते हैं।
कुछ लोग यह मानते हैं कि उनका भविष्य क़िस्मत या तक़दीर से तय होता है। ये लोग सोचते हैं कि दौलत, सफलता और अच्छा जीवन पाँसे फेंकने, पहिये के घूमने या लॉटरी में खुलने वाले नंबर पर निर्भर होता है।
कितनी मूर्खतापूर्ण बात है!
आँकड़ों के हिसाब से लॉटरी में दस लाख डॉलर जीतने की संभावना करोड़ों में एक है। लॉटरियाँ उन लोगों को आकर्षित करती हैं,जो मानते हैं कि सिर्फ़ कुछ डॉलर के निवेश से दौलत हासिल की जा सकती है। लॉटरी या किसी भी तरह का जुआ उन्हीं लोगों को फंसाने के लिये चलाया जाता है, जो सोचते हैं कि वे तकदीर या क़िस्मत के सहारे अमीर बन सकते हैं।
चाहने और सपने देखने में अंतर होता है। चाहना निष्क्रिय होता है। चाहना एक आलसी मनोरंजन है, जिसके पीछे न तो बुद्धि होती है, नही प्रयास परंतु सपने देखने के पीछे परिणाम हासिल करने की कार्ययोजना या एक्शन प्लान होता है।
जिम "चाहता है" कि उसे प्रमोशन मिले। परंतु जिम कभी स्वेच्छा से अतिरिक्त काम करने की पहल नहीं करता। वह अपने जरूरतमंद सहकर्मियों की मदद करने से बचता है। वह कभी अपनी तरफ से इस तरह का कोई नया सुझाव नहीं देता, "हम इसे क्यों नहीं आज़माते ?" क्या जिम की अधिक धन कमाने की इच्छा कभी हकीकत में बदल पायेगी ? ज़ाहिर है, नहीं।
मैरी "चाहती है कि वह उस अकाउंटिंग फर्म में पार्टनर बन जाये, जहाँ वह काम करती है। परंतु उसके पास एडवांस्ड अकांउटिंग कोर्स करने का “समय ही नहीं है।" जब दिन में 12 या 14 घंटे काम करने की ज़रूरत होती है, तब वह अपनी तरफ से मदद करने का कोई प्रस्ताव नहीं रखती। वह फ़र्म के ग्राहकों को टैक्स बचाने के सुझाव देने में भी बिलकुल मेहनत या कोशिश नहीं करती। परिणाम? मैरी की इच्छा कभी पूरी नहीं हो पाती।
टिम और सूज़न “चाहते हैं कि उनका अपना सफल बिज़नेस हो। परंतु वे वीकएंड के मनोरंजन को प्राथमिकता देते हैं। उनका सारा समय पार्टियों, सैर-सपाटे और मनोरंजन में ही गुज़र जाता है। और उनकी चाहत सिर्फ़ चाहत ही बनी रहती है।
देखिये, कोई भी कुछ भी चाह सकता है। परंतु सपने देखने वाला जब कुछ चाहता है, तो वह उसे हासिल करने के लिये मेहनत करता है।
आप अपने परिचितों को दो श्रेणियों में बाँट सकते हैं: विजेता और पराजित। विजेता सक्रिय स्वप्नदर्शी होते हैं। वे अपने सपनों को सकारात्मक व भौतिक उपलब्धियों में बदलने के लिये मेहनत करते हैं। पराजित निष्क्रिय दोषदर्शी होते हैं। वे यह मानते हैं कि “सिस्टम" उनके ख़िलाफ़ है और भविष्य भाग्य द्वारा तय होता है।
पराजित लोग दूसरों की बुराई करते हैं। “जून को प्रमोशन इसलिये मिला, क्योंकि उसने बॉस के साथ थोड़ा अतिरिक्त काम करवाया।" "फ्रेड को बड़ा ऑर्डर इसलिये मिला, क्योंकि उसने खरीदार को रिश्वत दी।" "पीट और सारा के पास नई मर्सिडीज़ है, पर शायद उन्हें पाँच साल तक इसकी क़िस्तें चुकाना पड़ेंगी।"
विजेता सद्भावना से भरे होते हैं। "मैं जॉन की उपलब्धि पर खुश हूँ। वह कड़ी मेहनत करता है और उसे पुरस्कार मिलना ही चाहिये।” "बेट्टी का प्रमोशन यह साबित करता है कि जब कोई बहुत अच्छा काम करता है, तो उसे उसका इनाम मिलता है।”
पराजित लोग निराशावादी होते हैं। “अर्थव्यवस्था चौपट हो चुकी है। देश कर्ज में डूबा है, व्यापारिक असंतुलन के चलते मंदी के बुरे दिन आने वाले हैं, इसलिये भविष्य के लिये निवेश करने की झंझट में मत फँसो।"
जो बड़े सपने देखते हैं, वे सोचते हैं, “इस समय अर्थव्यवस्था कितनी ही अच्छी या बुरी हो, यह बेहतर हो जायेगी। ऐसा हमेशा होता है। मैं एक महान भविष्य की कल्पना कर रहा हूँ। इसके अलावा, मैं देश की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित नहीं कर सकता, परंतु मैं अपनी अर्थव्यवस्था को तो नियंत्रित कर सकता हूँ।"
पराजित लोग स्वार्थी होते हैं। "यह मेरा काम नहीं है। मैं उसकी मदद क्यों करूँ ?" "किसी ने भी आज तक मेरे लिये कुछ नहीं किया।इसलिये में भी दूसरों के लिये कुछ नहीं करूँगा।"
विजेता उदार होते हैं। “पैसे कमाने में मैं दूसरों को जितनी मदद करूँगा, बदले में मुझे उतने ही ज्यादा पैसे मिलेंगे।” “दूसरे लोगों के लिये किये गये अच्छे कामों का पुरस्कार हमेशा मिलता है।"
पराजित लोग बिना कुछ दिये सब कुछ हासिल करना चाहते हैं। "मैं एक बड़ी कंपनी के लिये काम करता हूँ। मुझे ज्यादा तनख्वाह मिलना चाहिये।" "मैं यहाँ पर दस साल से हूँ। कंपनी को मुझे ज्यादा तनख्वाह देना चाहिये।" "एक्सपेंस अकाउंट में गड़बड़ी करो। सभी ऐसा करते हैं।"
"हालाँकि मैं बीमार नहीं हूँ, फिर भी मैं तीन दिन की बीमारी की छुट्टी ले लूँगा। यह मेरा अधिकार है। "
विजेता जानते हैं कि "दुनिया में मुफ्त में कुछ नहीं मिलता, "
"त्याग का मतलब है अपने और अपने प्रियजनों के सुखद भविष्य के लिये निवेश करना," और "कड़ी मेहनत इंसान को सुखी बनाती है।"जब हम लोगों की अधिकतम संभावनाओं को विकसित करने में उनकी मदद करते हैं, तो यह अपने आप में एक बड़ा पुरस्कार होता है। कई मैनेजर मुझे बता चुके हैं, “लोगों को औसत जिंदगी से बचाने और उन्हें सफलता का रास्ता दिखाने में मुझे बहुत संतोष मिलता है।" सेल्समैन बताते हैं कि किस तरह वे ग्राहक की मदद करते हैं, ताकि वह अपने बिज़नेस को नया आयाम देकर उसे लाभदायक बना सके। खेल प्रशिक्षक बताते हैं कि किस तरह वे किसी खिलाड़ी को साहस व दिशा देते हैं और फिर उसे मशहूर होते देखते हैं।
हाल ही में मैंने पाँचवीं कक्षा की एक स्कूल टीचर के सम्मान में आयोजित समारोह में भाग लिया। यह असामान्य बात थी, क्योंकि अधिकांश वयस्क अपनी पाँचवीं कक्षा की टीचर की परवाह नहीं करते हैं। कई बार तो वे उसे पूरी तरह भूल जाते हैं। परंतु इस समारोह में सैकड़ों लोग मौजूद थे। इन लोगों ने मिस वॉवर का आभार माना कि उन्होंने उनके लिये कितना कुछ किया था।
समारोह के बाद मैंने मिस बॉवर से पूछा, “आपने बच्चों के लिये क्या किया ?"
उन्होंने सोचते हुए जवाब दिया, "मैंने बच्चों को कभी बच्चा नहीं माना। मैंने अपने मस्तिष्क को इस तरह प्रशिक्षित किया ताकि मैं यह देख सकूँ कि ये बच्चे वयस्कता की मंज़िल की ओर बढ़ रहे यात्री ये बच्चे ऐसे पौधे हैं जो धीरे-धीरे परंतु निश्चित रूप से विशाल वृक्ष में विकसित हो रहे हैं। मैंने अपनी शैक्षणिक जिम्मेदारियों को तीन आयामों से देखा अच्छे माता पिता, अच्छे नागरिक और अच्छे कर्मचारी बनने में उनकी मदद करना। इसी मुख्य विचार ने मुझे राह दिखाई कि मैं उन्हें किस तरह और क्या पढ़ाऊँ।"
कितना अद्भुत उदाहरण है। यह उससे तो बहुत बेहतर है कि बच्चों को सिर्फ बच्चे ही माना जाये और यह सोचा जाये कि शिक्षा देना भी सिर्फ एक नौकरी है। मिस बॉवर ने बच्चों में छुपी संभावनाओं को देखा और उस संभावना को हकीकत में बदलने के लिये मार्गदर्शन देने की अपनी जिम्मेदारी समझी।
Credit: डेविड जे स्वार्टज
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